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मुझे मेरा बचपन लौटा दो

मुझे मेरा बचपन लौटा दो व खुशियाँ व बहारें लौटा दो। कल जो देखे थे सपने  एक कहानी की तरह आज वो कहानी की सच्चाई लौटा दो। जो कभी खेलते थे मिट्टी की गुडिया बनाकर आज वो मिट्टी की गुडिया में जान आ गई है , उस मासूम गुडिया को उसकी जहाँ लौटा दो। गुड्डा गुड्डी के खेल में जब हम रूठ जाया करते थे, तुम खूब मानाने आ जाते थे, उन खुशियों को आज लौटा दो। पल भर में वो गुडिया रानी बड़ी हो गयी उसकी वो शहर उसे लौटा दो … जान समझे थे जो, उस परी की कहानी में लौटा दो वो मासूमियत वो मुस्कुराहट … वो सारे ख़ुशीयाँ वो सारे पल जो साथ साथ गुज़ारे थे। लौटा दो वो गुडिया का आंचल जो आज टुकड़ों में बट गए हैं, लौटा दो वो गुड्डे की हंसती हुई आँखे जो आज तन्हाई के घेरे में हमें ढूँढ रही हैं। वो कागज की कस्ती वो बारिश का पानी जहा, भीगते हुए सारा जहां लुटाया करते थे, लौटा दो उन दिनों को, जो आज भी किसी कोने से रुक रुककर आवाज़ दे रहा है। लौटा दो उस मिट्टी की घर जो बड़े अरमान से सजाया करते थे, लौटा दो उन सारे यादें जो जामुन के पेड़ के नीचे ख्वाबों में सजाया...