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Showing posts from August, 2013

वह अंधेरा कुआँ,

जलियांनवाला बाग की एक तस्वीर काव्य के रूप में जो मैंने 2011 में लिखी थी। वह अँधेरा कुआँ ********** वह अंधेरा कुआँ, लाखों सिसकियाँ ----- आवाज़ दे रहा -- हजार धड़कने लुप्त होकर, एक अशरीर आत्मा पुकार रहा | अंधेरा कुआँ, जीर्ण शीर्ण शरीर रक्त माँस की बू- लाशें हैं भर भर के पानी की जगह भर ली हैं साँसें | मिट्टी के शरीर मिल गये मिट्टी में अंग्रेजों की लाठी की मार, ऊपर से गोलियाँ बेशुमार जान जाए मगर लाज़ न जाए----, वह अंधेरा कुआँ, लाखों सिसकियाँ -----। रह रह कर सुनाई दे रही है -- रोती, बिलखती आवाजें सन्नाटे में उस अंधेरे कुएँ से पूछते हुए  --- क्या अभी बंद हुई अंग्रेजों की गोलियाँ--? लुट लिए जो जान, मान, मगर माँ, मेरी माँ भारत की गोद में सर रख कर दे दी हमने अपनी जान क़ुर्बान,   अंधेरे कुएँ में ----| अपनी इज़्ज़त बचाते बचाते  महिलाएं जिन्होंने कुएँ में कूद कर जान दी थी-- क्या वह अत्याचार ख़त्म हुआ है? क्या खत्म हुये उन विदेशिओं के अत्याचार जो ज़ख्म दे-देकर छल्ली कर दिए थे माँ धरती की सीना, क्या भरे हैं वे जख्म के निशान-----? आह आह करती धरती माता ----- अश्रु और रक्त है झलकता जब मैं ...

समुद्री उफान

समुद्री उफ़ान उजली किरण और...................................हल्का सा अँधियारा कम्बल में छुप कर देखूँ...............................,जहाँ जाए नज़ारा, चिड़ियों की चहचहाट.............................और सूरज की किरणें                  खेलते हुए बच्चे और सागर की लहरें। नींद से जागे दुनियाँ............................चिड़ियों की चहकने से पलकें लगे भारी.......................................शबनम की बूंदों से- आँख मेरी बंद पर...........................अहसास करूँ में सृष्टि को       धन्यबाद करने से न थकूँ इतने सून्दर प्रकृति को। सुन्दर ये धरती............................................सुन्दर ये प्रकृति सुन्दर ये दिन ..........................................और सुन्दर ये रातें, जिस अंधकार में छुपी है..............................कई राज़ की बातें। अचानक देखूं ..........................................बदल रही है प्रकृति- ...

आक्रंदन

माँ रो रही है बेबस देख रही है रोज़ रोज़ लुटते हुए बेटीओं की इज्जत को समाज की हैवानियत को मासूमों की आक्रंदन को देख कर तड़प रही है।  समाज में हो रहे औरतों की बेइज्जती बेटीओं के आक्रंदन को रोज़ लुटते हुए बच्चीओं की इज्जत  लूट रही उनकी आज़ादी को   देख कर विलाप कर रही है। बेटी ओं मासूमियत का खून होते देख  कौन माँ भला चुप रह सकती है। औरत बेबस हो सकती है, एक बेटी, बहन, पत्नी बेबस हो सकती है ।.. बेबस समाज हो सकता है, कमजोर समाज हो सकता है लाचार लोग हो सकते है पर एक माँ नहीं … लड़की यों की सुरक्षा के लिए क्या उनकी मासूमियत छीन कर हाथों में छुरी थमा दी जाए ? क्या ये कहा जाए की जाओ अपनी सुरक्षा खुद करो …? माँ ये भी कर सकती है।  … अपनी बच्ची को बचाने के लिए कोई भी कदम उठा सकती है जरुरत पड़े तो …. बेटी की दामन छूने वाली हाथ भी काट सकती है। माँएँ ऐसी कोई कदम उठाने पर मजबूर हो जाए उससे पहले समाज जाग जाए तो अच्छा है, सरकार जाग जाए तो अच्छा है,…. अगर ऐसा हुआ तो ... समाज करेगा क्या? सरकार करेगा क्या ? क्या यही न्याय बाकी रह ग...