आक्रंदन

माँ रो रही है
बेबस देख रही है
रोज़ रोज़ लुटते हुए
बेटीओं की इज्जत को
समाज की हैवानियत को
मासूमों की आक्रंदन को
देख कर तड़प रही है। 

समाज में हो रहे
औरतों की बेइज्जती
बेटीओं के आक्रंदन को
रोज़ लुटते हुए बच्चीओं की इज्जत 
लूट रही उनकी आज़ादी को 
 देख कर विलाप कर रही है।

बेटी ओं मासूमियत का खून होते देख 
कौन माँ भला चुप रह सकती है।

औरत बेबस हो सकती है,
एक बेटी, बहन, पत्नी बेबस हो सकती है ।..
बेबस समाज हो सकता है,
कमजोर समाज हो सकता है
लाचार लोग हो सकते है
पर एक माँ नहीं …

लड़की यों की सुरक्षा के लिए
क्या उनकी मासूमियत छीन कर
हाथों में छुरी थमा दी जाए ?
क्या ये कहा जाए की जाओ
अपनी सुरक्षा खुद करो …?
माँ ये भी कर सकती है।  …

अपनी बच्ची को बचाने के लिए
कोई भी कदम उठा सकती है
जरुरत पड़े तो ….
बेटी की दामन छूने वाली
हाथ भी काट सकती है।

माँएँ ऐसी कोई कदम उठाने पर मजबूर हो जाए उससे
पहले समाज जाग जाए तो अच्छा है,
सरकार जाग जाए तो अच्छा है,….

अगर ऐसा हुआ तो ...
समाज करेगा क्या?
सरकार करेगा क्या ?

क्या यही न्याय बाकी रह गया है,
बेटी की इज्जत बचाने के लिए ?
बच्ची यों की सुरक्षा के लिए ?

ये देश की हर एक माँ की सवाल है ….
माँ की दिल की आवाज़ है
बच्चियों असुरक्षता देखते हुए माँ का आक्रंदन है।




©Lata tejeswar

8/22/2013

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