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नवदुर्गा

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नव दुर्गा नव लक्ष्मी तुम गृहलक्ष्मी और महाकाली तुम तुम जगत जननी, तुम गृह स्वामिनी  तुम अन्नपूर्णा और काली तुम तुम रक्षा कर्ता, तुम सहचरी सहधर्मिणी भी तुम। आदि से अंत तक तुम ही तुम फिर क्यों हथियार छोड़ बन जाती हो अबला भी तुम भूल जाती हो कि माँ हो तुम नारी अबला नहीं नारी सबला है  प्रमाण कर रक्षा खुद की करो बच्चियों के पावन जीवन की आन मान शान बनो तुम। माँ धरती हो तुम गृहलक्ष्मी हो तुम न भूलो कि नवदुर्गा भी तुम शस्त्र तुम्हारी हाथ में सदा रक्षा के खातिर फिर उठालो अब कि कोई बच्ची अब आहत न होगी कोई न होगी शिकार नवदुर्गा और नारी भी तुम ©लता तेजेश्वर रेणुका

ଜୀବନ ସଙ୍ଗିନୀ

ଜୀବନର କଷ୍ଟ ଘଡି ମାନଙ୍କରେ ସାଥେ ରହି  ମୋର ଜୀବନକୁ ଏକ କୋଳକୁ ଲଗେଇଲ ମୋର ଜୀବନ ସଙ୍ଗିନୀ  ତୁମେ ମୋର ଜୀବନ ହୋଇଲ। କଷ୍ଟ ସୁଖରେ ମୋତେ ସମ୍ଭାଳିଲ ଘର ସଂସାର ପିଲାଙ୍କ ସଂଗେ ପରିବାର ଦେଲ କେମିତି ତୁମର ଧନ୍ୟବାଦ କରିବି ଏବେତ କହିବ ମୋର ଜୀବନଟିର ନାଆ ଟିକୁ  ନଦୀର କୋଳରେ ଲଗାଇଲ, ହେ ମୋର ଜୀବନ ସଙ୍ଗିନୀ  ତୁମେ ମୋର ଜୀବନ ହୋଇଲ। ଚାଲ ଚାଲିବା ଏଇରାସ୍ତା ଡଗର ସଂଗେ ସଂଗେ ହାଥ ରେ ହାଥ ଧରି ସମୁଦ୍ରର ବାଲି ଗାମୁଛାରେ ସେଇ ଚାନ୍ଦ ତାରା ବାଦଲରେ ଘର ବସେଇବା  ତୁମବିନା ଜୀବନରେ ଏକ ପାଦ ଚାଲିବା ଅସହ୍ୟ ହେବ ହେ ମୋର ଜୀବନ ସଙ୍ଗିନୀ ତୁମେ ମୋର ଜୀବନ ହୋଇଲ। dedicated to Amma nanagaru ©Lata tejeswar renuka

ହେ ଜଗନ୍ନାଥ!

ହେ ଜଗନ୍ନାଥ! ତମେ ବଡ଼ଦାଣ୍ଡ ବୁଲି ଆସୁଛ ବର୍ଷରେ ଗୋଟିଏ ଥର ଗୁହାର ଶୁଣୁଛ ଦୁଃଖୀ ଗରିବ ଅନାଥଙ୍କର। ସପ୍ତ ଘୋଡା ବନ୍ଧା ରଥରେ  ତମେ ଖୁବ ସଜୁଛ ଶୃଙ୍ଗାର ଛେରା ପହଁରା ଦେଇ ମହାରାଜା କରନ୍ତି ସ୍ୱାଗତ ତୁମର। ଶହ ଶହ ଲୋକ ନାଚନ୍ତି ହୁଳହୁଳି ଦେଇ ରଥ ଟାଣନ୍ତି ତୁମ ପ୍ରେମରେ ହୋଇ ବିଭୋର। ସବୁ ଆଡେ ଆନନ୍ଦମୟ ଉଲ୍ଲାସମୟ ହୋଇ ଉଠେ ପ୍ରଭୁ ଏଇ ବାରଦିନ ବର୍ଷର। ତୁମର ମାୟା ଏଇଟା କେମିତି ପ୍ରଭୁ ତମେ କାଳିଆ ହୋଇ ବିରାଜିଛ ଲୋକଙ୍କ ମାନସ ପଟରେ। ଘର ଘର ଗଳି ଗଳି ଶଙ୍ଖନାଦ ଜୟ-ଜୟକାର ଫୁଲ ପ୍ରସାଦ ସହିତ ମହକି ଉଠେ  ପୁରୀ ବଡ଼ଦାଣ୍ଡଟି ତୁମର। ହେ ଜଗନ୍ନାଥ! ଅନନ୍ତ ଦୟା କରୁଣା ଅଛି ତୁମର ଗୁହାର କରିଲେ ହରୁଛ ସମସ୍ତ ଦୁଃଖ ପ୍ରଜାଙ୍କର। ମାଆ ଲଷ୍ମୀଙ୍କୁ ବସେଇ ହୃଦୟରେ ଭାଇ ବଳଭଦ୍ର ଆଉ ଭଉଣୀ ସୁଭଦ୍ରା ସଙ୍ଗେ କରୁଛ ଧନ୍ୟ ବଡ଼ ଦାଣ୍ଡକୁ ଆମର। ପ୍ରାର୍ଥନା ସ୍ୱୀକାର କର ହେ କାଳିଆ! ମନ ପ୍ରାଙ୍ଗଣରୁ ହିଂସା, ନିରାଶା  ଅନ୍ଧାରକୁ ଦୂର କରି ଭରିଦିଅ  ପ୍ରେମ ସ୍ନେହ ଆଉ କରୁଣା ଅପାର। © ଲତା ତେଜେଶ୍ବର

ले आओ बचपन को फिर से

मुझे मेरी बचपन से मिला दो दो प्यार भरा निवाला खिला दो भूल गयी हूँ जो दास्तां पुरानी वह सावन का झूला झुला दो। ले आओ बचपन को या लौट चलें  उन दिनों के बारिश के पानी में  जहाँ कागज की नाव बहाते थे। खो गयी हूँ बड़ों की दुनिया में बचपन की यादों से बिछड़ कर जिम्मेदारी के बोझ तले दब गयी हूँ भूली हुई दास्ताँ फिर याद दिला दो दो प्यार भरा निवाला खिला दो।

मातृभाषा हमारी संस्कृति

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हमारी मातृभाषा हमारी संस्कृति है। इसे बढ़ावा देने हमें खुद से ही शुरुआत करनी होगी नहीं तो इन भाषाओं को लुप्त होने से कोई नहीं बचा सकता। सभी भाषाएँ अपना महत्व रखतीं हैं,  अपने ही देश में अगर हम अपनी भाषा छोड़कर विदेशी भाषा की ओर मुख करते हैं तो हम अपनी मातृभाषा से अन्याय कर रहे होते हैं। वर्तमान समय की आवश्यकता को देख हमें बोली- भाषाओं के सीमित दायरों से निकल कर हिन्दी को शामिल करना होगा। जिससे इन भाषाओं का संगम देश में आपसी भाईचारा बढ़ाने में सहायक होगा और राष्ट्र को मजबूती प्रदान करेगा।     हमारी संस्था 'विविध भारतीय भाषा संस्कृति संगम' है जिसका मूल उद्देश्य है सभी भाषा- संस्कृतियों को बढ़ावा देना है और हम भाषाओं का मेलमिलाप संस्कृति करती प्रेमालाप' का नारा लिए चलते हैं। हर त्रै-मास में काव्यगोष्ठी रखी जाती है जिसमें सभी कवि-कवयित्रियों के लिए अपनी-अपनी मातृभाषाओं में काव्यपाठ की बाध्यता है। अब तक हमारी संस्था में ओड़िआ, तेलुगु, गुजराती, मराठी, मैथिली, भोजपुरी, अंग्रेजी, कन्नड़, संस्कृत आदि कई भाषी रचनाकार जुड़ चुके हैं। एक अंजुली में भारत की सभी भाषाओं को समेटना हमारा उद्...

हिंदी क्षेत्र से ही हिंदी के चुनौतियाँ

हिंदी क्षेत्र से ही हिंदी को चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। हिंदी भाषा में लिखना मेरे लिए गौरव की बात रही। मैं स्वतः ओड़िआ और तेलुगु प्रान्त से हूँ। मेरी ओड़िआ में शिक्षाप्राप्त हुई है और तेलुगु मेरी माँ की भाषा है यानी मातृभाषा। ओड़िआ और तेलुगु मेरे लिए उतना ही महत्वपूर्ण हैं जितना कि शरीर और आत्मा। ओड़िसा में पढ़ाई के दौरान 3साल हिंदी विषय मेरे पाठ्यक्रम में शामिल रहा इसलिए मैं हिंदी को अच्छी भली भाँति न सही लेकिन हिंदी सीखने समझने और लिखने तक का ज्ञान अर्जन किया है। जब परिवार सहित मुंबई आ गई वहीं से मैने हिंदी बोलना भी सीखा। इस तरह हिंदी भाषा मेरी जीवन में शामिल हुई। मुंबई में रहकर मैंने एहसास किया मराठी के साथ ही हिंदी भी बहुत ही अच्छी स्थान पर है। और अंग्रेजी का बोलबाला उससे भी ज्यादा है। 2007 से मैंने जब हिंदी में लिखना शुरू किया था कई बार मैंने अपनी रचनाओं को हिंदी पत्रिकाओं में भेजने को कोशिश की लेकिन उत्तर में मुझे निराशा जनक जवाब मिलता था। उस समय कुछ 5-6 हिंदी पत्रिका ही मुझे अंतरजाल पर नज़र आते थे और संपादक का कहना था उनकी पत्रिकाओं के लिए उनके पास पहले से लेखक मौजूद हैं और...

सुनो हे भागीरथी

सुनो हे भागीरथी! ****************** तोड़ बंधन सारी उन्मुक्त हो शिव का जटा से खुद को निकल आना सुनो हे भागीरथी! आकाश से धरती तक फैली है नफरत की ज्वालामुखी शांत हो ऐसा एक परिवेश ले आना। बहा ले जा...

नया साल2019

मेरा संदेश 2019 के लिए ******************* हे दिसम्बर तुम ऐसे आना जैसे पाक मंदिर से आती है भगवान का नाम ऐसे आना तुम जैसे खेतों से आती है भरी अनाज़ का ठेला तुम आओ तो यूँ भरे बदन में प्यार लाना होशो आवाज़ खो चुकी है  राजनेताओं की कुछ तालिम और इंसानियत  भर ले आना। किसान की जिंदगी यूँ महके  जैसे हरियाली हो बाग में सूखे कंकर में फूटे पानी की बौछार है तुम आना दुल्हन सी जगमगाती चेहरे लिए सदा रहना सुहागन सी भरी चूड़ियाँ और ग़ज़रों सी ठाठ लिए आना तुम राजाओं की महलों से जहाँ प्रजाओं का होता था बोलबाला  बिनकोई संका से न जाओ फिर दुबारा  फलो फूलो यूँ दिलों में बसना भारत वासियों के सीने में  जैसे दुल्हन छाप छोड़ती हाथों का  ससुराल की दीवारों में ऐसे आना तुम और महका जाना 2019 को और सियासी के दलदल को  ना भरना दिलों में मैं और मेरी तनहाई तुझसे बोलेंगे तब ही जब खिलेगा पंक में कमल और नदी होगी पावन गंगा सी। लौटके आना बार बार ऐसे दिशा देने तुम देश को नहला कर बारिश में पाक ममता भरना तुम पाक ममता भरना तुम। ©लतातेजेश्वर 'रे...

कभी तुमको बुलाऊँ कभी तुम्हें याद आऊँ

कभी तुमको बुलाऊँ कभी तुम्हें याद आऊँ पल पल तेरी खातिर तेरी ही गीत सुनाऊँ।1। कभी तुमको भुलाऊँ कभी तुम्हें याद आऊँ एक फूल खिल गया था तेरी याद आने से हवायें भी थम गयी तेरी मुस्क...