मातृभाषा हमारी संस्कृति
हमारी मातृभाषा हमारी संस्कृति है। इसे बढ़ावा देने हमें खुद से ही शुरुआत करनी होगी नहीं तो इन भाषाओं को लुप्त होने से कोई नहीं बचा सकता। सभी भाषाएँ अपना महत्व रखतीं हैं, अपने ही देश में अगर हम अपनी भाषा छोड़कर विदेशी भाषा की ओर मुख करते हैं तो हम अपनी मातृभाषा से अन्याय कर रहे होते हैं। वर्तमान समय की आवश्यकता को देख हमें बोली- भाषाओं के सीमित दायरों से निकल कर हिन्दी को शामिल करना होगा। जिससे इन भाषाओं का संगम देश में आपसी भाईचारा बढ़ाने में सहायक होगा और राष्ट्र को मजबूती प्रदान करेगा।
हमारी संस्था 'विविध भारतीय भाषा संस्कृति संगम' है जिसका मूल उद्देश्य है सभी भाषा- संस्कृतियों को बढ़ावा देना है और हम भाषाओं का मेलमिलाप संस्कृति करती प्रेमालाप' का नारा लिए चलते हैं। हर त्रै-मास में काव्यगोष्ठी रखी जाती है जिसमें सभी कवि-कवयित्रियों के लिए अपनी-अपनी मातृभाषाओं में काव्यपाठ की बाध्यता है। अब तक हमारी संस्था में ओड़िआ, तेलुगु, गुजराती, मराठी, मैथिली, भोजपुरी, अंग्रेजी, कन्नड़, संस्कृत आदि कई भाषी रचनाकार जुड़ चुके हैं। एक अंजुली में भारत की सभी भाषाओं को समेटना हमारा उद्देश्य है और यही इस संस्था का राष्ट्रीय चिह्न भी है। हमारी संस्कृति हमारी रग-रग में बसती है जो मातृभाषा के रूप में हमारे रक्त में दौड़ रही है। माँ की भाषा को बचाए रखने का प्रण लेकर हम चलते हैं। अगर हम इसी तरह से अपनी भाषाओं को बचाने की दिशा में प्रतिबद्ध हैं और रहेंगे तो मातृभाषाओं का भविष्य हमारे अंजुली में सुरक्षित रहेगा।
©लता तेजेश्वर 'रेणुका'
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