हिंदी क्षेत्र से ही हिंदी के चुनौतियाँ

हिंदी क्षेत्र से ही हिंदी को चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।

हिंदी भाषा में लिखना मेरे लिए गौरव की बात रही। मैं स्वतः ओड़िआ और तेलुगु प्रान्त से हूँ। मेरी ओड़िआ में शिक्षाप्राप्त हुई है और तेलुगु मेरी माँ की भाषा है यानी मातृभाषा। ओड़िआ और तेलुगु मेरे लिए उतना ही महत्वपूर्ण हैं जितना कि शरीर और आत्मा। ओड़िसा में पढ़ाई के दौरान 3साल हिंदी विषय मेरे पाठ्यक्रम में शामिल रहा इसलिए मैं हिंदी को अच्छी भली भाँति न सही लेकिन हिंदी सीखने समझने और लिखने तक का ज्ञान अर्जन किया है। जब परिवार सहित मुंबई आ गई वहीं से मैने हिंदी बोलना भी सीखा। इस तरह हिंदी भाषा मेरी जीवन में शामिल हुई। मुंबई में रहकर मैंने एहसास किया मराठी के साथ ही हिंदी भी बहुत ही अच्छी स्थान पर है। और अंग्रेजी का बोलबाला उससे भी ज्यादा है। 2007 से मैंने जब हिंदी में लिखना शुरू किया था कई बार मैंने अपनी रचनाओं को हिंदी पत्रिकाओं में भेजने को कोशिश की लेकिन उत्तर में मुझे निराशा जनक जवाब मिलता था। उस समय कुछ 5-6 हिंदी पत्रिका ही मुझे अंतरजाल पर नज़र आते थे और संपादक का कहना था उनकी पत्रिकाओं के लिए उनके पास पहले से लेखक मौजूद हैं और वह नए रचनाकार को स्थान देने में असमर्थ हैं। वह एक दिन था और आज एक दिन है कि कई नए-नए पत्रिकाएँ निकल रहे हैं और इनकी संख्या अब 30-35 से भी ज्यादा हैं। और हर माह कम से कम 8-10 किताब प्रकाशित होतीं हैं। हिन्दी के मासिक, द्वि-मासिक और त्रै-मासिक पत्रिकाएँ भारत में एक स्थायी जगह बना लिए हैं। इस तरह मैं हिंदी का समृद्धि ही देख रही हूँ। लेकिन जिस तरह हिंदी भाषी के लोग हिंदी के गिरावट को महसूस कर रहे हैं यह भी उतना ही चिंताजनक है।
जहाँ तक मैंने महसूस किया है दक्षिण से ज्यादा इन महानगरों में अंग्रेजी ज्यादा पैर पसार चुकी है। जो की आम जिंदगी की जरूरत और व्यवहारिक भाषा बन चुकी है। संस्कृत अब व्यवहार का भाषा न रहा। इस वजह से संस्कृत प्रायः खत्म होती जा रही है ऐसे ही अन्य कई भाषाएँ हैं जिन्होंने चुप-चाप बिना कोई आवाज़ के ही लुप्त हो गये हैं। भारत में 22भाषओं को मान्यता मिली है। मैथिली, भोजपुरी एबं अन्य कुछ भाषाओं को छोड़ दें तो मेरी नज़र में दक्षिण भाषाओं का भविष्य अब तक सही रास्ते गतियमान हैं। अगर हम ओड़िसा, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, केरल की ओर देखते हैं तो महानगरों की तुलना में इन राज्यों में मातृभाषा का स्थान अभी भी चरम पर है। यह इसलिए कह सकते हैं कि इन शहर में डिजिटलिकरण अभी उतना पैर नहीं पसारे हैं जितना की महानगरों में। गिनती के कुछ स्कूलों कॉलेजों के अलावा अंग्रेजी उतना सशक्त नहीं बनी है। कारण है मातृभाषा से प्यार। रोजमर्रा ज़िंदगी में व्यवहारिक भाषा को बल देना। दक्षिण में सोशल साइट पर भी मातृभाषा का प्रयोग ज्यादा है। लेकिन आनेवाली दो पीढ़ियों के बाद किस तरह बदलाव होंगे या अन्य भाषाओं की तरह मातृभाषाएँ लोप होने के कगार पहुँच सकते हैं इसका अंदाज़ा लगा पाना मुश्किल है। मगर इन राज्यों में अपनी भाषाओं को बचाए रखने की दिशा में बुजुर्ग कारगर साबित होते हैं क्यों कि इन जगह पर अब भी बुजुर्गों से संबंध, उनकी इच्छा और सम्मान का कारण भी है। दक्षिण में भाषा को बचाने जिस तरह की कदम लिया जाता है वह भी अनुगमन करने वाली बात है। क्यों कि अब तक दक्षिण के युवा पीढ़ी भी अपनी भाषा पर ज्यादा भरोशा करती है।
अगर हम हिंदी बेल्ट की बढ़ें जैसे डेल्ही मुम्बई उत्तरप्रदेश के शहरों में हिंदी की जो अवस्था है वह बिल्कुल ही सोचनीय है, यह इसलिए कि यहाँ हिंदी प्रशिक्षित लोग भी अन्य भारतीय भाषाओं से ज्यादा अँग्रेजी को मान्यता देते हैं। ये सच है अँग्रेजी हमारी जरूरत और रोटी बन चुकी है लेकिन हिंदी को सशक्त करने हमें अपनी मातृभाषाओं का सहारा लेना होगा और उसीसे अँग्रेजी भाषा की पूर्ति करनी होगी। चूँकि हिंदी भाषी दक्षिण भाषाओं को हिंदी से कमतर समझते हैं इसलिए दक्षिण भाषाओं से ज्यादा वे अंग्रेजी सीखना ज्यादा आधुनिक और गौरव समझते हैं। यही सोच हिंदी के लिए और हमारे लिए भी बहुत ही घातक है। हमें ये नहीं भूलना है कि भाषा, भाषा होती है न कम न ज्यादा। इसलिए दक्षिण में कोई भी भाषा हो एक ही नजरिये से देखा जाता है चाहे वह हिंदी हो या अँग्रेजी, इससे यह होता है आप सीखने में परहेज़ नहीं करते। अगर आप एक भाषा ज्यादा अपनाते हो इसमें आपकी महत्व बढ़ती है न कि कम होती है।
ऐसे में विदेश भाषा अँग्रेजी को कमजोर करने की आवश्यकता ही नहीं होगी अगर आप अपनी मातृभाषाओं को सशक्त करेंगे। इसके लिए कुछ जरूरी कदम उठाना होगा। मेरे अनुसार कुछ ऐसा कदम हो जिससे महाविद्यालयों में भी मातृभाषा या त्रै-भाषा का प्रथा को अपनाना, जिससे मातृभाषा को महाविद्यालयों कॉलेजों के पाठ्यक्रम में शामिल करना होना जिससे नई पीढ़ी को हिंदी सीखने की प्रेरणा मिले। नए-नए तकनीक, रोजगार और उपाधियों के दायरे बढ़ाने होंगे और हिंदी में साहित्य में भी रोटी कमाने का जरिया बने तभी नई पीढ़ी को हिंदी की ओर आकर्षित करने में और हिंदी को राष्ट्रीय भाषा बनाने में सफल होंगे।
©श्रीमती लता तेजेश्वर 'रेणुका'

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