बनावट
बड़े खुश नसीब हैं वह
जो बनावट समझते नहीं
जी लेते हैं खुद से लड़ते
न कोई महनीयता का आश है
न कोई अडम्बरता की
बस दो जून की रोटी
सब कुछ है
न तर्क न वितर्क
मिट्टी से मुँह लगते ही
नींद की चद्दर ओढ़ लेते हैं
थका हुआ किसी जवान की तरह ।
©लता तेजेश्वर 'रेणुका'
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