इंतज़ार में तुम्हारी

इंतजार मैं.... तुम्हारी..


जब तुम आए थे गुलाब की एक शाखलेकर
कितने आश छुपी थी जो तुम्हारे मन में-
न जाने क्यों आँखें तुम्हारी नम हो रहीथी बार बार,

समझ न पाई मैं कि वह तुम्हारी बिदाईकी घडी थी
जो तुम्हारे ओंठों से जाहिर नहीं हो पारही थी

वो मै भी तो पढ़ न पाई थी, 
कितनी नादान थी मैं।

 

जब दर्द भऱे आवाज से तुम बोल रहे थे -
हम तो सोचे थे सर्द हवा का असर है,

हमें क्या पता था की हमसे जुदा हो रहेथे-

गुलाब के फूल देकर जब तुम चल पडे थे

हम ने भी तो रोका न था तुम्हें,

सोचा लौट आओगे रोज की तरह।

जब सालों बीत गए, इंतजार में तुम्हारे-

आज समझ गयी हूँ मैं, तुम्हारा मन केभावों को

आँसू भरे आँखों से -तुम जो न कह सके

और जो मैं समझ न सकी-

आज वही दिन आ गया है, जिस दिन 
तुम आएथे फूल गुलाब के लेकर

प्यार का इजहार करने।

आज भी यह जानते हुए कि 

तुम नहीं आओगे, मेरे आँखे राह ताक रहेहैं,
वही गुलाब के शाख, आँख में पानी लिएतुम-
बस मेरे सामने खडे हो जाते हो बार बार,
न भूली मैं एक भी पल तुम्हारे साथगुजारी हुई।

आज भी इंतजार है कि कभी न कभी 
किसी न किसी मोड पर 
आकर खडे हो जाओगे सामने हमारे
इंतजार तो था ही...
लेकिन आज भी इंतजार है... 
और सदियों तक ये इंतजार बरकराररहेगा..

©लता तेजेश्वर 'रेणुका'

 


 

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