क्यों करते हैं बच्चे आत्महत्या
क्यों करते हैं बच्चे आत्महत्या?
कई बार लगता है कि कहीं बड़ें बच्चों को संस्कृति देने में चूक तो नहीं रहे हैं? या बच्चे हमारी सोच से कुछ कदम आगे बढ़कर दुनियादारी सिख गए? या हम पीछे रहगये और दुनिया आगे निकल गयी?
दुनिया के बदलते दौर के साथ साथ घर में सिखाये गए संस्कृती शायद ही कम पड़ रही है। एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ में बच्चे नए नए रास्ते ढूंढ़ने में लगे हैं। बच्चों में इस नयेपन को हासिल करने की चाह प्रवल होने लगा है। इस दौड़ में कभी परिवार की नाराज़गी का सामना करना पड़ता है तो कभी परिवार को समय देना मुश्किल हो जाता है। कुछ करने की जोश में आकर परिवार के मान्यताओं को संस्कृतीयों को कहीं पीछे छोड़ कर आगे बढ़ जाते हैं। सब से बड़ी बदलाव सुविधा की। जो कि उन्हें सरल और सहज से हासिल होती है वे उसे बहुत जल्द अपनाने लगते हैं। जब बड़ों के बताए हुए संकृती उनके पैर में बाधाएँ डालती हैं और मुश्किलें खडी करते हैं तब वे उन संस्कृती को छोड़ दूसरे सरल रास्ते अपनाने लगते हैं। जब स्त्रियों को साड़ी से ज्यादा कुर्ता पैजामा से सहज अनुभव होने लगा तो कामकाजी महिलाएं साड़ी छोड़ कुर्ते पैजमा को मान्यता देने लगे। वैसे ही बच्चे जीन्स टीशर्ट से सहज महसूस करने लगे तो सांस्कृतिक परिधान छोड़ दिया। इस तरह अपने रास्ते में आड़े आनेवाले कई चीज़ों को हटाने में नहीं पछताए।
जीवन में बदलाव जरुरी है, मगर जीवन के तारतम्य रिश्तों से जुडी है और इन रिश्तों को बचाए रखने के लिए अगर कुछ कदम पीछे हटाने पड़े तो निःसंदेह खुद को रोकना जरुरी है। लोगों के बनाए हुए रस्म-रिवाज पीछे ,कहीं,छुटने लगी है। आधुनिक दुनिया में लोगों के बनाए हुए रस्मों- रिवाज़ों को भी बदलना जरुरी है। स्त्री इस तरह के कई बंधनों को तोड़ कर आगे बढ़ रहीं हैं। जैसे मंदिरों में प्रवेश करना, कामकाज़ करने बाहर निकलकर अपने उपस्थिति को दर्ज़ करना भी जरुरी था। जिस तरह पुरूष प्रधान देश में स्त्रियों को एक घर की सुंदरता बढ़ाने वाली वस्तु के नज़र से देखते है उस तरह के कदम बहुत ही सराहनीय है। वैसे ही बच्चे भी अपने और अपनी काबिलियत के दायरे को मजबूत करने परिवार से कुछ आगे बढकर सोचते हैं। बच्चे भूल जाते हैं जिंदगी और भविष्य बनाना जितना जरुरी है परिवार से तारतम्य बनाए रखना भी उतना ही जरुरी है। माँ बाप के प्रती उनकी जिम्मेदारी घर परिवार के लिए उनका कर्तव्य निभाते हुए आगे बढ़ना चाहिए। चाहे लड़की हो या लड़का दुनिया को मुठ्ठी में करने के लिए ज़मीन से परिवार से दूर शहर या विदेश जा कर बस जाते।
परिवार से दूर होते इन बच्चों की जितना गलती है क्या उतना ही गलतियां उनकी बड़ों की भी है? क्या बडें बच्चों के परवरिश में चूक रहें हैं या ये समाज में तेज़ी से बदलते दौर की बदलाव से बच्चों की मानसिकता से जुड़ नहीं पाते। कंप्यूटर की जमाना से आगे निकल कर गूगल की तेज़ी से खुद को ढ़लने की कोशिश में कहीं गुमराह तो नहीं हो रहे। छोटी सी दिमाग में दुनिया की बड़ी बड़ी बातें और हर छोटी चीज़ की विस्तार से विवरण में खुद को ढूंढते हुए उनकी एक अलग निजी जीवन बनाने के लिए इस दौड़ में सामिल हो जाते हैं। कम उम्र में भावों के गहराई से जूझते हुए वे भीड़ में भी खुद को अकेले पाते हैं। माँ बाप दोनों के काम में व्यस्तता के चलते वे बच्चों से जुड़ने के लिए समय नहीं दे पाते। आज कल के स्कूल के फीस और रहन सहन के लिए घर के एक सदस्य की महीने का भत्ता कम पड़ा रही है। सामान्य परिवार के लिए एक अच्छी जिंदगी जीने के लिए बच्चों की परवरिश और अच्छी स्कूल में दाखिला और फ़ीस के लिए पैसे जुटाने के लिए माता पिता दोनों को काम करना जरूरी हो गया है। और इस वजह से बच्चों के लिए समय निकाल पाना और अच्छे संस्कृती दे पाना मुश्किल हो रहा है। बच्चे जो अकेले ही पलने के लिए मजबूर हैं उन्हें बुराई संगत का असर कभी कभी गलत रास्ते ले जाती है।
लेकिन इस होड़ में दुनिया के चापलूसी में फंस कर खुद को उन परिस्थितियों से बहार निकालने का रास्ता न पा कर बडें और परिवार से दूर हो कर आत्महत्या जैसे कदम उठा लेते हैं। लेकिन उन्हें ये कभी भूलना नहीं चाहिए इन परिस्थितियों से बाहर निकालने वाले और हर गलत कदम में भी साथ दे कर सही रास्ता दिखने वाले भी परिवार वाले ही हैं। चाहे कैसे भी मुश्किलें आन पड़े बच्चों को सही रास्ता दिखाने का कर्त्तव्य बड़ों का है, चाहे बच्चे कितने भी बड़े उम्र के हो जाए बड़ों के सलाह व उनकी आशीर्वाद रहे तो किन्हीं परिस्थितियों में भी वे बाहर निकल सकते हैं।
©लता तेजेश्वर 'रेणुका'
Comments
Post a Comment