कुछ खुशियों के पल चुरालिये हमने जिंदगी से

कुछ खुशियों के पल चुरा लें जिंदगी से
जिंदगी बहुत छोटी है, इस छोटी सी जिंदगी में खुशियों के पल बहुत कम आते हैं इसलिये जब भी ऐसे मौके आये तो उसे पूरे दिल से अपनाना चाहिए। कहते हैं दुःख बाँटने से आधा और खुशी बाँटने से दुगुना हो जाता है। खुश रहने के लिये नये नये बहाना भी बनाया जाय तो भी कोई बुराई नहीं। मुझे जिंदगी से कुछ पल की खुशियाँ चुराने में और दुसरों की मुस्कान में खुशियाँ बटोरने में अच्छा लगता है। आज कल लोग एकल परिवार की वजह से अपने परिवारों से दूर होते जा रहे हैं। मैं बचपन में माँ, पापा 6भाई बहनों के साथ पली बड़ी हुई। लेकिन शादी के बाद हम नौकरी पेशे होने के कारण मुम्बई आ गये। मेरे परिवार में कहने को हम 4 लोग हैं। मेरे पति तेजेश्वर के अलावा मेरे बच्चे श्रावण(23साल) और मेघा(19साल)। मैं हमेशा सब का साथ पसंद करती हूँ। मेरा मानना है कि परिवार की खुशियों के लिये अगर छोटी छोटी कुर्बानियाँ देनी पड़े तो करना चाहिए। हमें जब भी 2-4 दिन की छुट्टियाँ मिलती है हम दूसरे शहरों में घूमने चले जाते हैं। घर, ऑफिस, स्कूल और कॉलेजों से दूर, हर टेंशन को पीछे छोड़ रिलेक्स होने का एक भी मौका नहीं छोड़ते। उसमें अगर बड़ों का भी साथ मिल जाता है तो सोने पे सुहागा जैसी माहौल बन जाती है। हाल ही में मेरे माता पिता हमारे घर नवी-मुम्बई में घूमने आये। मेरे माता पिता को भगवान पर आस्था बहुत है। वे मंदिरों में घूमना पसंद करते हैं। मेरे बच्चे आधुनिक सोच रखने वाले, पूजा मंदिर से दूर ही रहते हैं फिर भी नाना नानी के लिये उनके ही इच्छा अनुसार हमने अपने पूरे परिवार के साथ शिर्डी जाने का प्रोग्राम बनाये। हमने शिर्डी में 2बेड रूम का एक सुइट पहले ही बुक करवा लिये। उनके साथ रहने से 4घंटे की लंबी लाइन भी कष्ट का एहसास नहीं हुआ। साईं के दर्शन के बाद सभी दर्शनीय स्थल देख नासिक के त्रयंबकेश्वर में भी 2दिन रहे। दो दिन में इतना प्यार बटोरा कि लगा कई साल बिछड़ने का भरपाई हो गया। बच्चे नाना नानी के साथ फुलटू एन्जॉय कर रहे थे और मेरे पापा मम्मी भी बच्चों सी हो गये थे। सच कहूँ तो सब के साथ जो खुशी है अकेले में कहाँ?
मेरे जीवन में मुझे बहुत खुशी देने वाले पल:
1. बड़ों के साथ घूमना फिरना, उनका ख्याल रखना।
2. परिवार के साथ लांग ड्राइव पर जाना और बाहर टाइम स्पेंड करना।
3. ‎वृद्धश्रमों में जाना और वहाँ के वृद्धों के सुख दुःख में शामिल होना, उनकी कहानी सुनना।
4. ‎मंदिर में कुछ मिनट शांती से आँखें बंद कर खुद से या भगवान से बातें करना।
5.     ज्यादातर रात में शांत मन से लिखते बैठना,
6. ‎शाम को बैडमिंटन खेलना या खेलते हुये बच्चों को देखना।
7. ‎नये नये डिशेस बनाना और सभी को खिलाना
8. ‎रेडियो पर गाना सुनना, गुनगुनाना (वैसे बहुत बुरी गाती हूँ)
9.   किताबें पढ़ना, कविता, कहानी आदि पत्रिकाओं के लिये लिखना।
10. दोस्तों से मिलना जुलना और शाम को वॉक के लिये जाना।

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