समीक्षा : गोदान
समीक्षा: गोदान
मुंशी प्रेमचंद जी का उपन्यास 'गोदान' इस जमीन से जुड़ी हकीकत को बयान करता है। इस उपन्यास में होरी की कहानी एक एक छोटे से गाँव से शुरू होती है। होरी एक किसान है। टैब भी और आज भी किसान जिस मनोव्यथा और पीड़ा को जी रहे है उन सब व्यथा को निष्कर्ष दिखाता है यह उपन्यास। होरी के जीवन की हर छोटी बड़ी इच्छाएँ पूरे होते होते हाथ से रेत की तरह फिसल जाती है। यह कहानी लोगों की मेहनत, दुख कष्ट से जुड़ी हुई एक जमीनी सच है। यह एक ऐसी कहानी है जिसमें एक पूरा गाँव समागया है। कहानी का प्रवाह नदी की तरह बिना किसी बाधा के बहता जाता है। पत्थर से टकराकर जैसे नदी का पानी उछलता है और फिर से नदी के प्रवाह में समाँ जाता है, वैसे ही इस कहानी के प्रवाह में होरी, धनिया ,गोबर, सोना रुपा, झुनिया, मेहता, राय साहब, मालती, गौतमी, सरोजा, सब बहजाते हैं। होरी और धनिया के जीवन में भी कई बार खुशियों की उछाल आती तो है लेकिन उतनी ही जल्दी जमींदोज हो जाती है। इस उपन्यास की शुरुवात गाय को खरीदने की लालसा से शुरू होती है और गोदान के तौर पर कुछ पैसों को दे कर खत्म हो जाती है।
सच कहूँ तो मुंशी प्रेमचांद जी के उपन्यास की समीक्षा करने जितनी बड़ी हस्ती नहीं हुई हूँ लेकिन जब पहली बार आप का उपन्यास पढ़ा तो मेरे मन इन जमीनी पात्रों की सच्चाई और सरलता के मोह में आ गयी। एक धारा में पढ़ती गयी और इस उपन्यास को पढ़ने के बाद मेरे मन में सोच का प्रवाह नदी की तरह बहने लगा। मुझे यूँ लगा जैसे इसमें हर पात्र बिल्कुल सजीव हैं और मेरे चारों तरफ जी रहे हैं।
इस उपन्यास में मुंशी जी ने हर पात्र, चाहे वह गोबर हो या धनिया, चाहे झुनिया हो या सोना, मालती हो या दातादीन, मातादिन या भोला, पूरी सच्चाई और ईमानदारी के साथ कहानी के हर पात्र का इंसाफ किया है। ये मुंशी जी की कलात्मकता ही है जिन्होंने अपनी कलम से एक ऐसे गाँव को सृष्टि करदी जो गाँव की सामाजिक और आर्थिक स्तर पर बिकुल सही बैठता है। राय साहब के दोस्त मंडली में शामिल मेहता जी, मालती जी, तंखा, गौतमी सभी का पात्र गौर करने की बात है। प्रेमचांद जी ने गोबर, धनिया, होरी, शोभा, सोना, रूपा, हीरा कुछ ऐसे नामों को चुना है जो सहज भी है और रोज़ मर्रा की जिंदगी में किसी न किसी तरह हमारे जीवन के हिस्से है। इन सब का प्रयोग उपन्यास में एक अलग छाप छोड़ता है। गाँव की मिट्टी की खुशबू, किसान का दर्द, उसकी हर बार तंगी से उबरने की चेष्टा करता एक परिवार जिसमें मानवता का कोई कमी नहीं।
पढ़ते हुए मुझे आश्चर्य हो रहा था कि कोई इंसान इतनी खूबसूरती से पूरे एक गाँव को कैसे अपने कलम में उतार सकता है। हर किसीका एक अलग किरदार है जो एक दूसरे से अलग होते हुए भी एक दूसरे से जुड़े हुये चलती है। दो जून की रोटी के लिए आदमी क्या क्या गुल खिलाता है, और क्या क्या हथकंडे अपनाता है उसका एक सही उदाहरण है यह उपन्यास। मुंशी जी ने आखिरी तक हर पात्र को जीवंत और संतुलित बनाए रखा है जो कि पाठक के दिल में अनायास ही उतर जाता है। गोबर का झुनिया को घर पर छोड़ कर शहर भाग जाना और उसकी कायरता के परिणाम स्वरूप होरी को बिरादरी से अलग न करने की शर्त पर सर्वस्व लुटादेना एक तरह से होरी और धनिया के परिवार को तहस नहस करदेता है।
बिरादरी के एक परिवार को अलग करदेने का डर कितना प्रबल है, आज कल के दिनों में देखने को नहीं मिलता। इन दिनों आदमी जितना अकेला होता है उतना ही आनंद के साथ जीता है। पूरी मेहनत के बाद भी पैसों की तंगी होरी के परिवार की कमर तोड़ देती है। फिर भी होरी हार नहीं मानता न ही आत्मियता को छोड़ता है। इन सब में धनिया का पात्र अहम है, जो होरी के जीवन का एक हिस्सा है, जिसके बिना होरी के व्यक्तित्व का परिचय नही मिल सकता था। सही है कि स्त्री घर की स्वामिनी है और उसकी राय का सर्वोपरि होना भी चाहिए। प्रेमचांद जी ने धनिया के पात्र के जरिए स्त्री के मनोबल को बढ़ाया है। जिसने हर दुख सुख में होरी को अपना सर्वस्व दे कर उसे खड़ा किया है।
हीरा के घर से भाग जाने के बाद उसकी पत्नि का ख्याल रखने के लिए होरीकी बेचैनी, उसके भाई के और उसके परिवार के प्रति उसका स्नेह और जिम्मेदारी को दर्शाता है। मेहता जी की स्त्री के प्रति एक अन्य धारणा जो मालती को दुखी करदेती है, और मेहता के प्रति दिल में ढेर सारा प्यार होने के बावजूद उन्हें अलग रखने का निर्णय लेकर स्त्री जाति के सम्मान को और उनके प्रति अपनी जिम्मेदारी को दर्शाती है। समाज में एक पत्रिका के प्रति समर्पण भाव रखना कोई आसान बात नहीं, क्यों कि पत्रिका को ईमानदारी से चलाना एक जंग से कम नहीं। पत्रकारिता की एक अलग समस्या होती है और उस पत्रिका को बनाये रखने के लिये खुद रॉय साहब से हाथ मिलाना, और उनकी कुछ शर्तों के गुलाम हो जाना भी उतने ही सच्चाई के साथ गढ़न किया गया है जो आदमी के समर्पण पर सवाल उठाता है। झुनिया का गोबर के साथ गाँव से निकल जाने के बाद गाँव और शहर के अंतर में ढल पाना झुनिया के लिये आसान नही था। तमाम बाधाओं, और पैसों की तंगी के बावजूद गाँव के साथ ताल मेल बनाये रखते हुए सोना और रूपा की शादी करना और कोई रिश्ता न होते हुये भी सल्लो की जिम्मेदारी उठाना होरी और धनिया का गाँव के प्रति अपनत्व, कर्तव्यनिष्ठा को दर्शाता है।
मैं जब यह कहानी पढ़ रही थी तब साथ ही कहीं ना कहीं कोई न कोई कमजोर कड़ी ढूँढ ही रही थी कि तब लगा सायद मुझे एक पॉइंट मिल गया है। खुद को फिलॉसफर कहलाने वाले मेहता जी के सोच। लेकिन जब मालती से विवाहित जीवन को लेकर चर्चा हो रही थी तब मालती का मेहता जी की सोच का तिरस्कार करते वहाँ से उठकर चलेजाना मेरे दिल को सूकून पहुंचाया। यूँ लगा उपन्यास को पढ़ते हुये शायद मैने उसमें एक पात्र कि तरह ढ़ल गयी हूँ। क्योंकि एक स्त्री किसी पुरुष को दिलो जान से प्यार तो कर सकती है मगर वह कभी ऐसे पुरुष को नहीं चाहेगी जिसके लिये अपना स्वाभिमान को सूली पर चढ़ादें और उसका हाथ थामे। यह बात मेरे मन को गहराई से छू गयी।
घुलमिलकर उपन्यास गोदान को एक उपन्यास कहने से अच्छा एक गाँव, देश भी कह सकते हैं। इस किताब के जरिए मुंशी प्रेमचंद जी का व्यक्तित्व उबर कर आता है। उनकी सरलता उनकी दूरदर्शिता, विषय के गढ़न में पारदर्शिता और हर विषय पर मजबूत पक्कड़ झलकती है। आशा करती हूँ मेरी जिंदगी में ऐसा एक उपन्यास मैं कभी साहित्य को दे पाउँ। इतना कुशल लेखन उन्हीं के कलम से ही रचा जा सकती है। प्रेमचंद जी की गोदान मेरे जीवन में पढ़ी हिंदी साहित्य, गद्य विधा की पहली किताब है, जो मैंने पूरे ध्यान से पढ़ने की हिम्मत की। और ये हिम्मत मेरी नहीं थी ये तो कहानी का प्रवाह था जो मुझे अंत तक कहानी के साथ बहा ले गया और इस उपन्यास को पढ़ने के बाद किसी पुस्तक पर मेरे जीवन का पहला समीक्षा लेखन है जिसे पढ़ने के बाद तुरंत ही उस पर कुछ लिखने को मन चाहा। प्रेमचंद जी के कई रचनाएँ हैं जो एक से बढ़कर एक बेहतरीन कहानियाँ और उपन्यास है। मैं खुश हूँ कि पहली बार ही सही विस्तार से एक समीक्षा लिखने की प्रेरणा मिली। पाठकों को विनती है, इस समीक्षा पर समीक्षा करके बताएँ की मैं कितना सही हूँ। मैं किसी भी विधा को बड़े बड़े साहित्यिक शब्द से उलझाना नहीं चाहती , मुझे सरल भाषा ही पसन्द है जो पाठकों के दिल में अनायास ही उतर जाए। अगर मेरी समीक्षा में कोई कमी रहगयी हो या कुछ गलत लिख गया हो तो पूरे दिल से नतमस्तक हो माफ़ी चाहूँगी।
© लता तेजेश्वर 'रेणुका'@समीक्षा: गोदान
Comments
Post a Comment