जलियांनवाला बाग की एक तस्वीर काव्य के रूप में जो मैंने 2011 में लिखी थी। वह अँधेरा कुआँ ********** वह अंधेरा कुआँ, लाखों सिसकियाँ ----- आवाज़ दे रहा -- हजार धड़कने लुप्त होकर, एक अशरीर आत्मा पुकार रहा | अंधेरा कुआँ, जीर्ण शीर्ण शरीर रक्त माँस की बू- लाशें हैं भर भर के पानी की जगह भर ली हैं साँसें | मिट्टी के शरीर मिल गये मिट्टी में अंग्रेजों की लाठी की मार, ऊपर से गोलियाँ बेशुमार जान जाए मगर लाज़ न जाए----, वह अंधेरा कुआँ, लाखों सिसकियाँ -----। रह रह कर सुनाई दे रही है -- रोती, बिलखती आवाजें सन्नाटे में उस अंधेरे कुएँ से पूछते हुए --- क्या अभी बंद हुई अंग्रेजों की गोलियाँ--? लुट लिए जो जान, मान, मगर माँ, मेरी माँ भारत की गोद में सर रख कर दे दी हमने अपनी जान क़ुर्बान, अंधेरे कुएँ में ----| अपनी इज़्ज़त बचाते बचाते महिलाएं जिन्होंने कुएँ में कूद कर जान दी थी-- क्या वह अत्याचार ख़त्म हुआ है? क्या खत्म हुये उन विदेशिओं के अत्याचार जो ज़ख्म दे-देकर छल्ली कर दिए थे माँ धरती की सीना, क्या भरे हैं वे जख्म के निशान-----? आह आह करती धरती माता ----- अश्रु और रक्त है झलकता जब मैं ...